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BeWaFaI ShaYrI HinDI हिंदी बेवफाई शायरी MyMatruBhashA.CoM

बेवफा शायरी-Disloyal Shayari
 
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अपने हर आह की दास्तां अर्ज किया है हमने
अपने हर जुर्म का बयां दर्ज किया है हमने

मुजरिम हुआ ऐ हुस्न, सूली पे लटका दो मुझे
गुनाह कुबूल है मुझे, तुमसे इश्क किया है हमने

मेरे गजल सुबूत हैं, देख लो ऐ दिल के मालिक
अपने हर आंसू की कीमत वसूल किया है हमने

तेरे दर पे मुझे कुछ न मिलेगा, ये जानकर भी
इस दिल के सहारे तेरी बंदगी किया है हमने 

* हर गजल एक दास्तां है, मेरे इश्क का बयां है
मेरा ये खामोश दिल दर्द का एक आशियां है

अपनी प्यासी सरहदों के पार तेरा शहर मिला
क्या खबर थी अपने घर में तू गैरों की सामां है

साहिलों पे चलनेवाले तूफानों से डर गए
इश्क का सागर सदियों से बेवफा से परेशां है

फूलों की बस्ती में आखिर कांटों का क्या काम था
ऐ खुदा तेरे गुलशन में आ जाती क्यूं खिजां है 

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* सावन भी गुजर जाएगा, आंसू भी बिखर जाएगा
एक बार जो तू आ जाए, पतझड़ भी संवर जाएगा

मेरे इश्क का चकोर तो चंदा से जुदा हो गया
अब तो वो इस खिजां में रोकर ही मर जाएगा

दिल के इन नश्तरों में दुख भी हैं, सुख भी हैं
कभी खिलेंगे गुलाब तो कभी पेड़ उजड़ जाएगा

मुझको मेरी तन्हाई देती है ये दिलासा
ये दिल न लगा उनसे जो लौटकर फिर जाएगा 

* जाने क्यूं बेचैनियां हैं तेरी इन निगाहों में
तेरे जुबां खामोश खत हैं, क्या लिखा है आहों में

गमजदा तेरी सूरत पे खौफ का जो मंजर है
चांद डूब रहा हो जैसे गर्दिश की पनाहों में

कोई तमन्ना दिल में तेरे अपना जोर लगाती है
तड़प-तड़प कर मांग रही हो किसको तुम दुआओं में

ये घनेरी काकुलें जो चूमती हैं गालों को
एक हसीं तस्वीर हो तुम मेरी इन निगाहों में 

* दिल जख्मी है, जिस्म खाक है और जेहन परेशान है
दीवाना तेरी दुनिया में कुछ दिन का मेहमान है

एक समंदर सैलाबों का, जलता हुआ एक सहरा सा
एक पैकर में शोला-शबनम, तेरी आंखों की शान है

हालत दुश्मन क्या समझेगा, जाने कब शमा बदलेगा
मौत के दर पे मैं खड़ा हूं, कैद में मेरी जान है

चांद सुलगता पत्थर है, रात का आलम बंजर है
मेरे लम्हों के मंजर में कोई सुबह न शाम है 

* आहें दिल की आरजू हैं, दर्द ही तमन्ना है
इश्क ही गुनाह मेरा, फिर सजा तो सहना है

मुश्किलों के इस दौर में दूर है मेरी दिलरुबा
ऐसी तन्हाई में मेरे मुश्किलों को बढ़ना है

तेरी आंखों के दरवाजे खुलते हैं बस मेरे लिए
लेकिन तेरे आशियां में गैरों को ही रहना है

लड़ जाऊंगा मैं दुनिया से लेकिन तू रुसवा होगी
दाग न तुझपे लगने देंगे, खुद से ही बस लड़ना है 

* देखता हूं आईना, देखता हूं कुछ नहीं
अपनी सूरत के बारे में सोचता हूं, कुछ नहीं

सुन लो मैंने क्या सीखा है तेरे ही आईने से
देखता हूं मैं बस तुमको, बोलता हूं कुछ नहीं

देखना गर देखना हो, देख लेना खुद ही को
आखिर में तुम पाओगी, आईना है कुछ नहीं

देखना भी एक हुनर है, आईना है निगाहों में
अपने अंदर जब-जब देखा, बाहर देखा कुछ नहीं 

* अगर पत्थर के सीने में भी कोई दर्दे-दिल होता
किसी शीशे को ये तोड़े, कभी मुमकिन नहीं होता

मसीहा ने जमाने को सिखाया राह पे चलना
मगर दुनिया में कोई सच्चा मुसाफिर नहीं होता

जिस्म में दर्द ही रूह का अहसास करता है
हर किसी के सीने में ये जख्म का खंजर नहीं होता

दाग ये धुल न जाए, आग ये बुझ ना जाए
इश्क में इनके सिवा और कुछ हासिल नहीं होता 

* छू गई वो चांदनी काली घटा में छुप गई
इश्क की शमा जलाकर वो शहर में खो गई

हर अंधेरे में उजाला आस बनकर रहता है
तेरे आने की हर आहट जुगनू बनकर बुझ गई

जी नहीं लगता आशियां में तेरे बिन शाम ढले
रातों के इन रहगुजरों पे जिंदगी तन्हा रह गई

आईना दिल की दास्तां को रोज ही दुहराता है
एक कयामत संवर के उसमें, उसका दिल तोड़ गई 

* शाम तो ढल गई अब तो शमा जल जाने दो
ऐ खुदा चांद को घर से तो निकल जाने दो

कोई धरती पे नहीं जिसे देखूं मैं जी भरके
निगाहों में महबूब की तस्वीर तो बन जाने दो

तेरी खामोशी सहेजूंगी मैं जुदा रहकर
अपनी आवाज को तुम मुझमें तो खो जाने दो

अपनी मिट्टी से बनाऊंगी मैं मूरत तेरी
मेरे इस रूह को एक दीद तो मिल जाने दो 

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